शर्मा हवेली

“बेटा, तू डरता तो नहीं न?”

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“नहीं दादा जी…”https://walanews.com/

तो सुन… यह बात पचास साल पहले की है। तब मैं सत्रह साल का था। पढ़ाई में कम, शरारतों में ज्यादा मन लगता था। हमारा गांव ‘धोबना’ था, बिहार के एक कोने में बसा छोटा सा गांव। बिजली के खंभे सिर्फ पंचायत भवन तक ही थे। रात होते ही पूरा गांव अंधेरे में डूब जाता था, जैसे किसी ने चादर ओढ़ा दी हो।

“गांव के किनारे थी एक बड़ी सी पुरानी हवेली — शर्मा हवेली ।लोग कहते थे, वो हवेली अब ‘ज़िंदा नहीं’ रही।मतलब, वहां अब इंसानन हीं, कुछ और रहते थे।पर हम जैसे नासमझ लड़के हंसी उड़ाया करते थे।”

“गोलू, मेरा सबसे अच्छा दोस्त।वो मेरे जितना ही पागल था।एक दिन दोपहर में हम बैठ कर साइकिल की ट्यूब जोड़ रहे थे, तभी गोलू बोला — ‘तू डरता है शर्मा हवेली से?’ मैंने हंसते हुए कहा, ‘अरे भूत-वूत कुछ नहीं होता!’ और वहीं शर्त लग गई — ‘जो रात को जाकर हवेली काअंदर वाला दरवाज़ा छूकरआएगा, उसे गांव की सबसे बड़ी लस्सी मिलेगी।’”

unnamed-edited शर्मा हवेली

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“हम दोनों ठान लिए — रात को 12 बजे हवेली में घुसेंगे।सबको झूठ बोलकर , हाथ में टॉर्च लेकर निकल पड़े।हवेली की दीवारें काई सेढंकी थीं, खिड़कियां टूटी हुईं और छत पर चमगादड़ उल्टे लटके थे।अजीब सी सड़न की गंध आ रही थी, जैसे किसी पुराने कुएं में सड़ी लाश रखी हो।”

“जैसे ही अंदर कदम रखा, पूरा माहौल ठंडा हो गया। गर्मी के मौसम में भी वहां हवा बर्फ जैसी लग रही थी। हमने देखा – एक टूटा हुआ झूला हिल रहा था, जबकि हवा कहीं नहीं थी।”

“गोलू बोला – ‘ये झूला कौन हिला रहा है?’

मैंहँसकेबोला – ‘भूतझूलाझूलरहेहोंगे!’

पर हँसी वहीं थम गई जब दीवार पर एक लाल रंग से लिखा दिखा —

‘GAURAV, AB TERI BAARI HAI’

गौरव… यानी मैं।”

“मैंसिहरगया।हमनेदेखानहींथाकिकोईऔरआयाहो, फिरमेरानामकिसनेलिखा?”

“अचानक गोलू रुक गया — उसके चेहरे पर डर नहीं, जड़ता थी। उसने कहा, ‘तू सुना? किसी ने मेरा नाम लिया… मेरी मां की आवाज़ थी।’

मैंनेकानलगाए — औरतबमुझेभीसुनाईदिया — ‘गोलू… बेटा, बाहरआजा…’वोआवाज़उसकीमांकीलगरहीथी… लेकिनवोआरहीथीहवेलीकेअंदरसे।

“गोलू बिना मेरी तरफ देखे, सीधा उसआवाज़ कीओर चल पड़ा — और हवेली के सबसे अंदर वाले दरवाज़े की ओर गया — जोआधाखुलाथा।

मैंनेउसेरोकनेकीकोशिशकी — ‘गोलू! रुक! येतेरीमांनहींहै!’

परवोजाचुकाथा।”

“दरवाज़ा खुद-ब-खुदबंद हो गया — ज़ोर की आवाज़ के साथ।”

“मैंभागा… चिल्लाया… परसबबेकार।”

“दो दिन बाद, गांव वालों को गोलू की लाश मिली — हवेली के सबसे अंदर वाले कमरे में।आंखें खुली थीं, मुंहकुछबोलनेकीकोशिशमेंथा, लेकिनजमचुकाथा।डॉक्टरनेकहा – हार्टअटैक।”

“पर मैंने देखा था – उसकी आंखों में वो चीज़ जो उसने देखा था।और उसक मरे में सिर्फ एक दीवार पर लिखा था —

‘Ek gaya… ek baaki hai.’

“मैं घर लौट आया, पर मेरी ज़िंदगी बदल गई।रात को सपनों में गोलू आता, कभी रोता, कभी चेतावनी देता।

एक रात, मैं बिस्तर से गिरा— देखा मेरी छाती पर उंगलियों के निशान थे।किसी ने दबाया था… मुझे सोने नहीं देता था।”

“मैंने ठान लिया — या तो मरूंगा, या इसका सामना करूंगा।

मैंफिरगयाहवेलीमें।इसबारअकेला।

उस दरवाज़े तक पहुंचा — औरदेखा कि दीवार परअब लिखा था:

‘TUNE AANE MEIN DER KAR DI… AB JAANE NAHI DENGE.’

“कमरे में घुसते ही अंधेरा और ठंड इतनी बढ़ गई कि मेरी सांसें जम गईं।तभी देखा — गोलू खड़ा था… पर उसका चेहरा इंसानी नहीं था… जला हुआ, टूटा हुआ… वो बोला — ‘तेरा नंबर है गौरव…’ और फिर पीछे से किसी ने मेरी गर्दन पकड़ली।”

“बसइतनायादहै— मैंबेहोशहोगया।

जब आंख खुली, मैं गांव के तालाब के किनारे पड़ा था।लोगों ने बताया— मैं तीन दिन से गायब था।परमैंजानताहूं— मैं मरा था… और किसी ने मुझे लौटने दिया।

“उसदिनकेबादमैंबदलगया।मुझेरातमेंनींदनहींआती।

अब जब कोई हवेली की बात करता है — मैं चुप हो जाता हूं।

मेरीआंखें… अबकालीनहीं, हल्कीनीलीहोगईहैं।

औरकभी-कभी, मैं खुद को हवेली के उसी कमरे में खड़ा पाता हूं…

जहां दरवाज़ा खुद से खुलता है… और कोई कान में फुस फुसाता है—

‘एकऔरचाहिए…’

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